अरण्डी की खेती, अरण्डी की कीमत, अरण्डी में खाद व उर्वरक, अरण्डी की फसल में रोग

अरण्डी की खेती, अरण्डी की कीमत, अरण्डी में खाद व उर्वरक, अरण्डी की फसल में रोग

अरण्डी का बीज वानस्पतिक तेल प्रदान करने वाली खरीफ की एक मुख्य वाव्य्साहिक फसल है यह तिलहनी फसल भी है और अरण्डी का तेल उपयोग में आता है जेसे साबुन रंग वार्निश, कपड़ा रंगाई, उद्योग प्लास्टिक चमडा में काम आता है। इसकी बुवाई खरीफ और कटाई रबी मोसम में होती है। इस फसल में पाले  का  प्रभाव पड़ता है और खाद और उर्वरक गोबर सबसे पहले खरपतवार में में ही दिया जाता है और उसके बाद निराई – गुड़ाई करके फिर पानी का छिडकाव करके  यूरिया खाद डाला जाता है तथा बोने का समय अगस्त से सितम्बर तक होता है। अरण्डी की फसल में 3-4 बार खरपतवार की जाती है अरण्डी की फसल 4 – 5  माह में पक कर तेयार हो जाता है इसका पकने का समय मार्च – अप्रैल महीने में होता है और उसके बाद इसकी फली को तोड़ कर इक्कठा करते है बाद में इसके थ्रेसर से ली जाती है। बारिश के मोसम में इस फसल में पाला पड़ना हो जाता है। तब फसल पूरी तरह से मुरझा जाती है।

अरण्डी का बुवाई का समय  –

  • अरण्डी की फसल का बुवाई का समय अगस्त से सितम्बर माह में होता है।
  • अरण्डी की फसल बुवाई खरीफ व कटाई रबी मोसम में की जाती है।
  • किसान इसी माह में बुवाई करने जुट जाते है।

अरण्डी में खाद व उर्वरक  –

  • सरसों की फसल में खरपतवार करने के साथ साथ में अनेक प्रकार के खरपतवार उग जाते है।
  • खरपतवार को नियंत्रण करने के लिए निराई – गुड़ाई करनी जरूरी है।
  • निराई – गुड़ाई सिर्फ 4 – 5 बार ही की जाती है।
  • अरण्डी फसल में सबसे पहले गोबर खाद डाला जाता है।
  • अरण्डी फसल में सबसे पहले गोबर खाद डाला जाता है।
  • अरण्डी फसल का बीज बोते समय डीएपी खाद डाला जाता है।
  • अरण्डी फसल में खरपतवार करके उसके बाद पानी छिडकाव करके यूरिया खाद डाला जाता है।

अरण्डी की फसल में सिंचाई  –

  • अरण्डी की फसल में बुवाई करने के बाद 2  ही पानी दिया जाता है।
  • इसके बाद 25-30 दिन के बाद निराई  गुड़ाई के बाद पानी दिया जाता है।
  • अरण्डी की फसल में अधिक पानी छिडकाव किये जाते है।

अरण्डी  की फसल में तापमान  –

  • अरण्डी  की फसल में तापमान की जरूरत अधिक होती है।
  • अरण्डी की फसल में तापमान 20  से 27′ डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की जरूरत है।

अरण्डी की फसल में रोग  –

  • अरण्डी की फसल में रोग अंगमारी रोग – यह अरण्डी की बहुत ही व्यापक बीमारी है सामान्य रूप से यह बीमारी पोधो के  15 – 20 से. मी. ऊँचा होने तक उसकी प्रारंभिक बढवार की अवस्थाओ में लगती है रोग के लक्षण बीज पत्र की दोनों सतहों पर गोल एवं धुधले धब्बे के रूप दिखाई पड़ते है।
  • सेमीलूपर रोग  – सेमीलूपर इस फसल का बहुत ही विनाशकारी किट है। इसको तेजी से रेंगने वाली लट जी लम्बी होती है। फसलो को खाकर कमजोर कर देती है।
  • तना छेदक किट  – तना छेदक किट की इल्ली गहरे तथा भूरे रंग की होती है। यह प्रमुख रूप से अरण्डी के तनो तथा संपुट को खाकर खोखला कर देती है।
  • रोयेवाली इल्ली  – खरीफ वाली फसलो में रोये वाली इल्ली इस फसल को अधिक हानी पहुचाती है।

अरण्डी की फसल पकने व कटाई करने का समय  –

  • अरण्डी की फसल अधिक समय तक पानी का छिडकाव करना पड़ता है।
  • अरण्डी की फसल  3 – 4 महीने लग जाते है पकने में
  • अरण्डी की फसल पकने का समय मार्च व अप्रैल में आ जाती है।
  • इस महीनो में फली पक जाती है फिर इसको तोड़ कर इक्कठी कर लेते है।

अरण्डी की फसल में छिड्काव  –

  • अरण्डी की फसल में फ्लेट फैन से छिडकाव किया जाता है।
  • फल्ड जेट नोजल से छिडकाव किये जाते है।
  • मिनी नोजल से छिडकाव किये जाते है।

अरण्डी की फसल का उपयोग  –

  • अरण्डी के तेल का उपयोग यह एक वानस्पतिक तेल होता है।
  • अरंडी के तेल का इस्तेमाल मुहांसों को हटाने के लिए किया जाता है।
  • बालो को मुलायम करने के लिए भी अरंडी का तेल इस्तेमाल किया जाता है।
  • अरंडी का तेल दाद के इलाज में भी उपयोग होता है।

अरण्डी की खेती कहा होती है  –

  • अरण्डी की खेती राजस्थान और गुजरात में होती है।
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